क्या सीखना और स्कूल जाना एक ही बात है?
हाल ही में लोकमत समाचार में श्री. सुनील सोनी का शिक्षा पर एक लेख प्रकाशित हुआ। लेख में Paulo Freire, शिक्षा की संस्थागत बनावट और deschooling जैसे विचारों की चर्चा करते हुए आख़िरी पंक्ति में अपने KnowSchool का उल्लेख किया गया।
यह उल्लेख हमें इसलिए महत्वपूर्ण लगा क्योंकि लेख मे KnowSchool को किसी “अलग तरह के school” की तरह नहीं, बल्कि शिक्षा को लेकर दुनिया भर में लंबे समय से चल रही एक बड़ी खोज के भीतर रखा।
वह सवाल बहुत सीधा है - क्या सीखना और school जाना एक ही बात है?
ब्राज़ील के शिक्षाविद Paulo Freire ने उस तरीके पर सवाल उठाया जिसमें बच्चा मानो एक खाली बर्तन है और शिक्षक उसमें ज्ञान भरता है। उनके लिए सीखना - बातचीत, अनुभव और अपने आसपास की दुनिया को समझने से जुड़ा था। Ivan Illich ने अपनी चर्चित किताब Deschooling Society में इससे भी आगे जाकर पूछा कि कहीं हमने सीखने को schooling से बहुत कसकर तो नहीं बाँध दिया है।
इसी तरह इंग्लैंड के Summerhill और अमेरिका के Sudbury Valley School जैसे प्रयोगों ने लंबे समय से यह समझने की कोशिश की है कि क्या बच्चों को यह आज़ादी दी जा सकती है कि वे अपने समय, अपनी रुचियों और रोज़मर्रा के अनुभवों के साथ थोड़ा ज्यादा अपने ढंग से जुड़ सकें।
KnowSchool इनमें से किसी तरीके की नकल नहीं है। लेकिन हम भी उसी बुनियादी बात को समझने की कोशिश कर रहे हैं की बच्चा सच में सीखता कैसे है?
क्या बच्चा केवल तभी सीखता है जब उसे कोई सिखा रहा हो?
क्या हर उम्र के बच्चे को एक तय गति से चलना चाहिए?
क्या खेलना, बातें करना, घूमना, चीज़ें बनाना, किसी काम में अटकना और फिर दोबारा कोशिश करना भी सीखना है?
KnowSchool में हम इनके तैयार जवाब देने की कोशिश नहीं कर रहे।
हम बच्चों और परिवारों के साथ इन्हें जीकर समझने की कोशिश कर रहे हैं।
और शायद इसका सबसे कठिन हिस्सा बच्चों के लिए नहीं, हम माता-पिता के लिए है।
बच्चे को हर समय निर्देश न देना।
हर बात में तुरंत यह न बताना कि अब क्या करना चाहिए।
हर अनुभव का “फायदा” न पूछना।
दूसरे बच्चे से तुलना रोकना।
यह समझना कि कब साथ रहना है और कब उसे अपने तरीके से कुछ करने देना है।
इसीलिए KnowSchool केवल बच्चों का समुदाय नहीं है। यह parents का भी समुदाय है। बच्चा अकेले रहकर “पीछे रह जाएगा”, “आगे क्या करेगा?”, “बाकी बच्चे तो…” जैसी चिंताओं से निकलना बहुत कठिन है। लेकिन जब कई परिवार साथ होते हैं, बातचीत करते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं और बच्चों को अलग-अलग तरह से बढ़ते हुए देखते हैं, तो धीरे-धीरे यह भरोसा बनता है कि हर बच्चे का रास्ता एक जैसा होना कतई जरूरी नहीं है।
Deschooling केवल बच्चे को school से बाहर निकालने का नाम नहीं है।
उससे कहीं कठिन काम है - अपने भीतर बैठे school को पहचानना।
इसलिए लोकमत समाचार की आख़िरी पंक्ति हम सब के लिए केवल खुशी की बात नहीं, एक जिम्मेदारी भी है। KnowSchool का उद्देश्य किसी एक सही तरीका तय कर देना नहीं है।
शायद हर चीज़ पहले से तय कर देने की हमारी जरूरत ही हमें सबसे ज्यादा बेचैन करती है।
हम चाहते हैं कि KnowSchool एक ऐसी जगह बना रहे जहाँ बच्चे और बड़े दोनों सवाल पूछ सकें, अपने तरीके खोज सकें, बदल सकें और जरूरत पड़े तो पहले मानी हुई बातों को फिर से आजमा सकें।
शायद KnowSchool का असली काम यही है - बच्चों के लिए जगह बनाते-बनाते, हम बड़े भी यह सीखें कि जीवन को हर समय तय, नापा और नियंत्रित करना जरूरी नहीं है।

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