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मम्मी-पापा, जरा खेलिए तो सही !

Writer: Sapna Patil
Sapna Patil
Apr 15
3 min read

हम बड़े लोग खेल को अक्सर हल्का काम समझते हैं। लगता है बच्चा खेल रहा है, समय कट रहा है, थोड़ी भागदौड़ हो जाएगी, फिर रात को चैन से सो जाएगा। मामला खत्म। लेकिन खेल इतना सीधा भी नहीं होता। बच्चा जब अपने माता-पिता के साथ खेलता है, तब वह सिर्फ गेंद नहीं पकड़ रहा होता, या लूडो नहीं खेल रहा होता। वह यह भी समझ रहा होता है कि साथ होना क्या होता है।



बच्चों को समझाने वाले बड़े बहुत मिल जाते हैं। खेलने वाले कम मिलते हैं। बच्चा यह फर्क जल्दी पहचान लेता है। जब आप उसके साथ खेलते हैं, बिना हर दो मिनट में टोके, बिना उसे सुधारने निकले, तब उसे लगता है कि इस समय आप सच में उसके साथ हैं। यही बात उसके भीतर भरोसा बनाती है। धीरे-धीरे वह खुलने लगता है। कुछ बोलता है, कुछ बनाता है, कुछ अपने मन से जोड़ता है।


खेल में रिश्ता भी बनता है, और बड़ी शांति से बनता है। बिना भाषण, बिना घोषणा। बच्चा कभी अपने नियम बना देता है, कभी कहानी जोड़ देता है, कभी हारकर मुँह फुला लेता है, कभी जीतकर ऐसे चलता है जैसे पूरे मोहल्ले का चुनाव जीत आया हो। अगर आप ध्यान से देखें, तो खेल में उसका मन भी दिखने लगता है। बच्चा बैठकर अपने बारे में नहीं बताता। खेलते-खेलते बहुत कुछ बता देता है।


खेल सोच को भी चलाता है। अब क्या करूँ। यह कैसे होगा। अगर यह रास्ता बंद है तो दूसरा क्या है। नियम मानूँ या बदल दूँ। यानी खेल में बच्चा दिमाग भी लगाता है, और उसे यह बोझ भी नहीं लगता। यही उसकी खास बात है। वही बात कॉपी-किताब में भारी लग सकती है, खेल में मज़ेदार लगती है।

और बच्चा सिर्फ खेल नहीं खेल रहा होता। वह आपको भी देख रहा होता है। आप हारने पर कैसे रहते हैं। गलती होने पर हँसते हैं या चिढ़ जाते हैं। नियम निभाते हैं या अपने हिसाब से मोड़ देते हैं। बड़े लोग समझते हैं कि बच्चा ध्यान नहीं दे रहा। बच्चा चुपचाप सब देख रहा होता है।


शरीर का काम भी खेल में खूब होता है। दौड़ना, कूदना, झुकना, पकड़ना, फेंकना, संतुलन बनाना। बच्चा अपने शरीर को ऐसे ही समझता है। उसे यह नहीं लगता कि वह कोई अभ्यास कर रहा है। उसे तो बस मज़ा आ रहा होता है। यही खेल की खूबी है। काम भी हो जाता है, और माथे पर शिकन भी नहीं आती।


फिर भावनाओं की बारी आती है। खेल में जीत भी है, हार भी है, इंतज़ार भी है, चिढ़ भी है, फिर से कोशिश भी है। बच्चा धीरे-धीरे सीखता है कि हर बार बात उसके मन की नहीं होगी, और फिर भी खेल छोड़ा नहीं जाता। थोड़ा रुकते हैं, थोड़ा संभलते हैं, फिर लौटते हैं। यह छोटी बात नहीं है। आगे चलकर यही बहुत काम आती है।


अच्छी बात यह है कि खेल के लिए महंगे खिलौने जरूरी नहीं हैं। बाज़ार ने खेल को भी सामान की सूची बना दिया है, पर बच्चे अब भी डिब्बे, चॉक, पत्थर, तकिए, गेंद और थोड़ी-सी खाली जगह से खुश हो जाते हैं। उन्हें हर बार नई चीज़ नहीं चाहिए होती। उन्हें साथ चाहिए। और वह भी ऐसा, जिसमें आपका ध्यान सच में उनके पास हो, किसी और जगह नहीं।

सच यह भी है कि खेलते समय हमें अपने बारे में भी थोड़ा पता चलता है। तब दिखता है कि हम कितनी जल्दी में रहते हैं, कितनी जल्दी बच्चे को टोक देते हैं, और हर चीज़ अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं। हर खेल को पढ़ाई बना देने की आदत भी दिख जाती है। बच्चा तो बस खेलना चाहता है। हम बीच में गुरुजी बन जाते हैं। यहीं थोड़ा रुकना पड़ता है। हर खेल का मतलब उसी समय समझाना जरूरी नहीं होता। कई बार उसका असर बाद में समझ आता है।


इसलिए बच्चे के साथ खेलना कोई extra काम नहीं है। यही वह जगह है जहाँ रिश्ता नरम होता है, बात खुलती है, सोच चलती है, शरीर काम करता है, और बच्चा थोड़ा-थोड़ा अपने भीतर मजबूत होता है। ऊपर से सब साधारण दिखता है। भीतर बहुत कुछ बन रहा होता है।


अगली बार जब आप बच्चे के साथ फर्श पर बैठें, गेंद उछालें, भागें, छुपें, या कोई अपना ही अजीब-सा खेल बना लें, तो उसे बस समय काटना मत समझिए। हो सकता है उस समय कुछ खास होता हुआ न दिखे। पर अक्सर सबसे जरूरी चीज़ें ऐसे ही बनती हैं - चुपचाप, खेल-खेल में।

 
 
 

1 Comment


Pramod Kesalkar
Pramod Kesalkar
Apr 16

सही है, 👍🙏💐

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